आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की ॥ धृ. ॥
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला ।
श्रवण में कुण्डल झलकाता, सिर मोर मुकुट लसकाता ।
छवि लखि मोहि जुगल लाला ॥ १ ॥
जहां ते प्रगटी गंगा, कलुष कलिहारिणि श्रीगंगा ।
स्मरन ते होत मोह भंगा, बसी शिव शीश जटा के बीच ।
हरै अघ कीच, चरन छवि श्रीबनवारी की ॥ २ ॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की ॥ धृ. ॥