जय संतोषी माता, जय संतोषी माता ।
अपने सेवक जन की सुख सम्पति दाता ॥ ध्रु० ॥
सुंदर चीर सुनहरी मां धारण कीन्हों ।
हीरा पन्ना दमके मुकुट शीश दीन्हों ॥ १ ॥
घंटा ताल मृदंगा बाजत सहनाई ।
अक्षत धूप दीप से आरती संजोई ॥ २ ॥
गुड़ और चना परम प्रिय नित भोग लगावैं ।
कथा सुनैं जो ध्यावैं सब आनन्द पावैं ॥ ३ ॥
जय संतोषी माता, जय संतोषी माता ॥ ध्रु० ॥
शरण गहे की लज्जा राखो जगदम्बा ।
दासी की सुधि लीजो मात विलंबा ॥ ४ ॥
जय संतोषी माता, जय संतोषी माता ॥ ध्रु० ॥