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श्री हनुमानचालीसा~7 मिनिटे

श्री हनुमान चालीसा

रचनाकार: गोस्वामी तुलसीदास (Goswami Tulsidas)

॥ दोहा ॥

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि ।

बरनउं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि ॥

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार ।

बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार ॥

॥ चौपाई (१ ते १०) ॥

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुं लोक उजागर ॥ १ ॥

राम दूत अतुलित बल धामा । अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा ॥ २ ॥

महाबीर बिक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ॥ ३ ॥

कंचन बरन बिराज सुबेसा । कानन कुंडल कुंचित केसा ॥ ४ ॥

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै । कांधे मूंज जनेऊ साजै ॥ ५ ॥

संकर सुवन केसरीनंदन । तेज प्रताप महा जग बंदन ॥ ६ ॥

बिद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥ ७ ॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लखन सीता मन बसिया ॥ ८ ॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा । बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥ ९ ॥

भीम रूप धरि असुर संहारे । रामचंद्र के काज संवारे ॥ १० ॥

॥ चौपाई (११ ते २०) ॥

लाय सजीवन लखन जियाये । श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥ ११ ॥

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई । तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥ १२ ॥

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं । अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥ १३ ॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा ॥ १४ ॥

जम कुबेर दिगपाल जहां ते । कबि कोबिद कहि सके कहां ते ॥ १५ ॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥ १६ ॥

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना । लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥ १७ ॥

जुग सहस्र जोजन पर भानू । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥ १८ ॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । जलधि लांघि गये अचरज नाहीं ॥ १९ ॥

दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥ २० ॥

॥ चौपाई (२१ ते ३०) ॥

राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥ २१ ॥

सब सुख लहै तुम्हारी सरना । तुम रच्छक काहू को डर ना ॥ २२ ॥

आपन तेज सम्हारो आपै । तीनों लोक हांक तें कांपै ॥ २३ ॥

भूत पिसाच निकट नहिं आवै । महाबीर जब नाम सुनावै ॥ २४ ॥

नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥ २५ ॥

संकट तें हनुमान छुड़ावै । मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥ २६ ॥

सब पर राम तपस्वी राजा । तिन के काज सकल तुम साजा ॥ २७ ॥

और मनोरथ जो कोई लावै । सोइ अमित जीवन फल पावै ॥ २८ ॥

चारों जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥ २९ ॥

साधु संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ॥ ३० ॥

॥ चौपाई (३१ ते ४०) ॥

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता । अस बर दीन जानकी माता ॥ ३१ ॥

राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥ ३२ ॥

तुम्हरे भजन राम को भावै । जनम जनम के दुख बिसरावै ॥ ३३ ॥

अंत काल रघुबर पुर जाई । जहां जन्म हरि-भक्त कहाई ॥ ३४ ॥

और देवता चित्त न धरई । हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥ ३५ ॥

संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥ ३६ ॥

जै जै जै हनुमान गोसाईं । कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥ ३७ ॥

जो सत बार पाठ कर कोई । छूटहि बंदि महा सुख होई ॥ ३८ ॥

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥ ३९ ॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय मंह डेरा ॥ ४० ॥

॥ समापन दोहा ॥

पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप ।

राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ॥

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