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श्री दुर्गा / महालक्ष्मीस्तोत्र~2 मिनिटे

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र (अयि गिरिनन्दिनि)

रचनाकार: आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya)

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दसुते

गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।

भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते

त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते ।

दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥

अयि निजहुङ्कृतिमात्रनिराकृतधूम्रविलोचनधूम्रशते

समरविशोषितशोणितबीजसमुद्भवशोणितबीजपते ।

शिवशिवशुम्भनिशुम्भमहाहवतर्पितभूतपिशाचरते

जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥

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